जात्रा जगन्नाथ की-२

April 4th, 2010 by rklall

फ्रेश होकर खाने के लिए निकल पडा.  सडक चौडी है.  जगन्नाथ की यात्रा जो निकलती है.  ट्रैफिक अनियंत्रित लेकिन जल्दी किसी को भी नहीं.  इसीलिए दुर्घटना  की संभावना कम से कम है.

एक जात्रा जगन्नाथ की

March 28th, 2010 by rklall

गाडी धीमी गति से चल रही है. पता नहीं ट्रैक में क्या खराबी है. कभी रफ्तार पकड लेती है तो कभी जडभगत. लेकिन सब कुछ सही है- केवल पडोसी के जो जमशेद पुर उतरेंगे. बातुनी हैं. उनके परिवार की बातें पदार्थों तक सिमटी है. अत: सरदर्द हो रहा है. ट्रेन ए.सी. है और ठंड भी है- कंबल का सहारा है. कहीं न कहीं सुख पर दु:ख छाया है तो दु:ख सुख पर. आप बाहर जो सुख चाहेंगे- वो असंभव है. बीच बीच में झटका लगेगा ही. बाहर हल्की बुंदाबांदी है- टुपुर टुपुर. पता नहीं जगन्नाथ जी के मन में क्या है?****
कंप्युटर का मानवीय संवेदना क्या मतलब. सीटों का आरक्षण एक जगह न होकर कोई इधर-कोई उधर. एक सीट तो छोड देना पडा क्योंकि वह दूसरे डब्बे में था. अलग अलग बैठने से संवाद कम हो पा रहा है- जिसकी भरपाई पडोसी कर रहे हैं. ****
शाम के चार बजे हजारीबाग के सद्य: स्नात जंगल से गुजरना अच्छा लगा. छोटी छोटी नदियां तीव्र वेग से बह रही हैं. खाने में मुगलसराय के जामुन और पारसनाथ के आस-पास अंकुरित चने का स्वाद- अद्बुत-लाजवाब. जमशेदपुर सभी उतर जाएंगे. कुछ नये जुडेंगे तो कुछ बिछुरेंगे. प्रकृति में निवृत्ति और प्रवृत्ति साथ साथ चलता है- जिसे मह्सूस करना ही बुद्धिमानी है.
*****
पुरुषोत्तम एक्स्प्रेस चलने का नाम नहीं ले रही है. हर छोटे छोटे स्टेशन पर रुक रही है. सुबह के झुरमुटे में हरीतिमा का सैलाब. ताड के पेड, केले का जंगल, निर्मल पानी के पोखर, ताल तलैया, दूर दूर तक पहाडों का विस्तार… आंखों का सुकून. चारों ओर हरीतिमा का साम्राज्य छाया हुआ था. क्या ईश्वर ने सारे संसार को हरे रंग की बाल्टी में डुबो दिया है. ऐसा कौन चित्रकार होगा जो इस विशाल कैनवास पर रंग-बिरंगे चित्र उकेरता होगा? प्रकृति की इस विविधता से सभी मंत्रमुग्ध थे. ******

पुरुषोत्तम एक्स्प्रेस सात घंटे लेट है. अति सर्वत्र वर्जयेत. बच्चों की धीरता गायब हो रही है. थकावट के अक्स उनके चेहरे पर उभर रहे हैं. ए.सी. डब्बा सबसे पीछे लगा दिया गया था. खोमचे वाले भी सोच समझकर उधर आते थे.
******
कटक से पहले विस्तृत नदी का पाट. प्रकृति के उदात्त सौंदर्य का प्रतीक. निर्मल पानी में छ्पाक. बेटा जो हरेक नदी ताल तलैया को प्रणाम करके थक गया था बेहद उत्साहित था. “पापा कोई बडा शहर आने वाला है- गंदे पानी का सैलाब महानदी में जा रहा है.” बहुत सारी गंदगी एक बडे शहर की पहचान बनती जा रही है. यह एक विडंबना ही है. हमलोग शहर को सौंदर्यीकरण से जोडने से नहीं अघाते. लेकिन प्रदूषण का एक बडा हिस्सा मनुष्य के ही जिम्मे क्यों आता है?********

भुवनेश्वर स्टेशन राजधानी का पडाव है. उडिया समझ में नहीं आ रही है- बंगला उच्चारण से थोडा बहुत समझ पा रहा हूं. लोगों की वेश भूषा बदल गई. नंगे बदन पर सूती तौलिया- फैशन पैशन नहीं है. इसीलिए लोग तनावग्रस्त नहीं लगते. आखिरकार ट्रेन घिसटते घिसटते पुरी पहुंच ही गई.
******
अप्रत्याशित रूप से पंडे की पूछ्ताछ कम है. सामान के साथ स्टेशन से बाहर निकला तो आउटो वाले मधुमख्खी की तरह चिपट गये. एक से भाव तोल करके निकल पडा आशियाने की तलाश में. भीड सडक पर- धर्मशाला में और सब जगह. निलाद्रि लॊज में कमरा मिला- चिंता मिटी. इस तरह खाने पीने रहने की सुविधा एक ही जगह. धन्य हो जगन्नाथ!
*********

आज के हालात

March 24th, 2010 by rklall

मुलायम के शब्द तो, होते बहुत कठोर !
सीटी मारे घूम के, थामे धोती का इक छोड !!

समाजवादी भीड में, रहते लोहिया मौन !
वैचारिक परिपक्वता, होने लगी है गौण !!

कानू-चारु-संथाल को, मेरा लाल सलाम !
बिला गए सिंदधांत सब, नहीं रहा अब मान !!

आई पी एल में हो रही, पैसों की बरसात !
चौके-छ्क्के पर नाचती, बाला बारंबार !!

कामनवेल्थ के गेम में, वेल्थ की है मांग !
हम सब को निचोड लो, जैसे चूसे आम !!

मोदी जी अब क्या करें, कहीं रहा ना ठौर !
एस आई टी के प्रश्न का, ढूंढे हल चहूं ओर !!

खैर खून खांसी खुशी, रहिमन की यह बात !
मोदी भला कब मानते, अहंकार जब साथ !!

कौओं की इक पांत है, बगुलों के परवान !
रामदेव जी कर रहे, हंसों की पहचान !!

राजनीति में हे प्रभु, थके अघाए लोग !
भोगी के इस भीड में, नहीं सुहाता योग !!

करोल बाद नई दिल्ली भीड़-भाड़

March 6th, 2010 by rklall

करोलबाग का भीड-भार वाला रास्ता. पैर रखने तक की जगह नहीं. लेकिन कार की संख्या में कोई कमी नहीं. लोग जहां चाहे उस भीड में ही अपनी कार घुसाने से नहीं चूकते. ध्यान से देखिये. किसी भी कार में एक या दो से अधिक शक्ल नजर नहीं आयेंगे. लेकिन ये चंद लोग सारे रास्ते को बाप की जागीर की तरह इस्तेमाल करते हैं. दूसरे तंग हों उनसे उन्हें क्या लेना देना. यह उनका स्टेटस सिंबल है- दिखलाना है कि हम कार वाले हैं. नहीं तो कुछ थोडे पैसे देकर ही वे यहां तक पहुंच सकते थे. यह जो दिखाने का शगल है वो कुछ सालों से ज्यादा फला फूला है. अनाप शनाप पैसा ही आंखों का पानी सोख लेता है, दिल को बेदिल बना देता है, चमडे को मोटा कर देता है और दिमाग को कुंद कर देता है.

छणिकाएं

January 31st, 2010 by rklall

हम तो बता देंगे पता इस राह की, पूछ्ना था आप हैं क्या- राहजन या राहगीर
देश की चिंता किसे कब था मगर, सेंकने के लिये अंगीठी जल गई
प्रांत को मानुस बनाने की फिकर, मनसे पूछो आपके मन में है क्या
आंख पर चश्मा जुबां पर आग है, हर तरफ है आग देश तबाह है
दाल की बदकिस्मती गलती नहीं, शरद की कंपकंपी तो होनी चाहिए
अब खोज कर लाओ किसी आयत कुरान का, जिसमें लिखा हो हुक्म कत्लेआम का

हिन्दी की किस्मत

January 28th, 2010 by rklall

हिन्दी का रोना फिर से शुरु है. अब हिन्दी को राष्ट्रभाषा कहने में भी शक है. पता नहीं क्यों जब कभी भाषा की बात आती है हमें हर तरफ हिन्दी के प्रति विद्वेष की भावना नजर आती है. सारे फिकरे हिन्दी के लिये ही हैं. जैसे कि हिन्दी को सहज सुबोध होना चाहिये, हिन्दी न जानते हो तो अंगरेजी के शब्द हिन्दी में लिख दो, हिन्दी के शब्द हिन्दी के न हो- कोई बात नहीं, कोशिश करो हिन्दी हिन्दी न लगे- ये सारे वाक्य हिन्दी के लिये ही सुशोभित किये जाते हैं. कोई यह नहीं कहता कि आपकी अंगरेजी क्लिष्ट है- समझ में नहीं आती. क्योंकि आपमें हीन भावना है. हां यदि आप यह कहते हैं कि हमें हिन्दी कम आती है या नहीं आती है – तो आप अपने आप पर गर्व करने लगते हैं. हम खुश हैं अपनी गुलामी से. हम हिन्दी दिवस पितरों के श्राद्ध की तरह मनाते हैं. सात-दस दिन अर्घ्य देकर संतुष्ट हो जाते हैं. हम अपने भाषा संस्कार को ऊपर उठाने की चेष्टा नहीं करते अपितु चाहते हैं कि निराला राम की शक्तिपूजा न लिखकर जैक एंड जिल की कविता लिखें. आखिर कब तक हम स्तरहीन हिन्दी की दुहाई देते रहेंगे? ऐसी सोच से किसी भारतीय भाषा की उन्नति नहीं होगी. फिर पढे लिखे लोग ही हिन्दी के अस्तित्व को अस्वीकार करने लगेंगे तो हमारी राष्ट्रियता का क्या होगा?

Is Hindi not a national language?

January 26th, 2010 by rklall

Recently a judge has viewed that hindi is not a national language. It is surprising to think that after more than 60 years of independence, we donot have any language which represent whole country’s view. Why are we so neglected person? Some times we wonder whether we have suicidal attitude. We want to give away all those things which are ever related with our country’s identity. Though we are generous enough to take global cultures in our stride, but it does not mean that we should even hesitate to say that we are Indians.

कतरनें

January 9th, 2010 by rklall

इकोनोमिस्ट के देश में, अर्थ हुआ बेहाल ! रोटी चावल गुम हुए, और न पकती दाल !!

आंखों में निर्लज्जता ओठों पे मुस्कान ! यह छवि है राठौड की,  पुलिस हुई बदनाम !!

चलती चाकी सेक्स की, देख तिवारी रोय ! ऐसे वैसे (कु) करम के  वैसा ही फल होय !!

दिल्ली ठिठुरी ठंड में, कोहरे की है तान !  पिच की सांस उखड रही कुछ तो रखो मान!!

थरूर जी के आस पास,  ठकुरसुहाते लोग  ! सावधान हो कर कहें, तोल मोल कर बोल !!

अर्थतंत्र का अर्थ

January 7th, 2010 by rklall

सरकार बेहद ख्श है कि देश का विकास तेजी से हो रहा है.  विकास का सेंसेक्स जी डी पी से आंका जा रहा है.  विकास के इस तंत्र में आम आदमी पीछे घिसट रहे हैं.  विकास के इस दौर में कल्याण्कारी अवधारणाएं विलुप्त होती जा रही हैं.  सरकार कल्याण्कारी पैकेज की घोषणा इस प्रकार करती है जैसे कि वह आम आदमी को भीख दे रही हो.  डुगडुगी पीटी जाती है.  होना तो यह चाहिए कि सारी योजनाएं आम आदमी को केंद्र बिंदु बनाकर कार्यान्वित की जाएं.  लेकिन इसके उलट आज केंद्र बिंदु में व्यापारी, माफिया, धन्ना सेठ आदि हैं.  उनसे आप क्या अपेक्षा कर सकते हैं.  सरकार यह उम्मीद करती है कि एक न एक दिन उनके अंदर सुमति आ जाएगी.  क्या यह संभव है?  कदापि नहीं.  जब तक संसद में व्यापारी, माफिया, धन्ना सेठ का वर्चस्व है तब तक यह संभव नहीं है.

कु और सु

December 27th, 2009 by rklall

यह बात जेहन में आती है कि जब ईश्वर सद विचार के प्रतीक हैं तो उन्होंने संसार को साफ सुथडा क्यों नहीं बनाया.  यहां असत्य, झूठ फरेब क्यों है, क्यों हम  बुराइयों के शिकार बनते हैं .  इस तरह के विचार हमें ईश्वर के अस्तित्व को नकारने के लिये मजबूर करते हैं.  लेकिन यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो आपके संदेह का निराकरण हो जाएगा. ईश्वर ने संसार के निर्माण में उन सभी घटकों को शामिल किया जो  निर्माण के लिये आवश्यक थे. कल्पना कीजिये आप निर्माणकर्ता हैं और आप केवल उन्हीं तत्वों को शामिल कर रहे हैं, जो सु…… से संबंधित हैं. उदाहरण के लिये माना कि आपने सुख से संबंधित सभी घटकों के निर्माण का विचार किया है.  आप क्या करेंगे? आप बनायेंगे सुख, सुविचार, समृद्धि आदि. लेकिन इन तत्वों के होने या न होने को आप कैसे महसूस करवाएंगे. इसके लिये आपको उन छायों का निर्माण करना पडेगा, जो उसके विपरीत हों. यदि दुःख न हो तो आप सुख को महसूस कैसे करेंगे?  दो विपरीत घटकों के निर्माण से ही इस दुनिया का अस्तित्व है.  अतः कु और सु के झंझट में न पडकर ईश्वर पर विश्वास करें.